Jammu and Kashmir

यह संघर्ष धर्म के लिए नहीं, लोकतंत्र के लिए था: उमर अब्दुल्ला ने 13 जुलाई के शहीदों का किया बचाव

श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर

जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने रविवार को राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के नेताओं को 13 जुलाई के शहीदों की कब्र पर जाने से रोकने के सरकारी निर्णय की कड़ी आलोचना की। उन्होंने इस प्रतिबंध को लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले शहीदों का अपमान बताते हुए कहा कि यह भारत में ब्रिटिश शासन, रियासतों के शासन और लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले लोगों के सम्मान के खिलाफ है।

उमर अब्दुल्ला ने बीजेपी द्वारा उनके खिलाफ हाल ही में जारी किए गए कानूनी नोटिस को ‘प्रेम पत्र’ करार दिया और भाजपा पर अदालतों के पीछे छिपने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यह कदम केंद्र शासित प्रदेश में सामान्यता के आधिकारिक दावों की गंभीर उपेक्षा है। शहीदों की स्मृति को बाधित करना लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है और यह जनता में असंतोष और सवाल खड़े करता है।

उन्होंने कहा, “यह लड़ाई किसी भी धर्म के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए थी। हमें याद रखना चाहिए कि 13 जुलाई वे लोग शहीद हुए जो न केवल ब्रिटिश शासन, बल्कि तत्कालीन मुस्लिम शासकों के अन्याय और अत्याचार के खिलाफ भी खड़े हुए।” उमर अब्दुल्ला ने कहा कि इस दिन का इतिहास सबके लिए प्रेरणादायक है और इसे राजनीतिक विचारधाराओं से ऊपर समझने की जरूरत है।

स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 13 जुलाई को हुई घटना जम्मू-कश्मीर के लोकतांत्रिक संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उस दिन, कई युवा नेताओं और आम जनता ने एक साथ मिलकर प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई थी और कई लोग अपने जीवन की आहुति दे बैठे। इस दिन की याद में मार्टर्स ग्रेवयार्ड विशेष महत्व रखता है, जो लोकतंत्र पसंद जनता के लिए एक प्रतीक है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार को जनता की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और ऐसे धार्मिक या राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर इस दिन की गरिमा बनाये रखनी चाहिए। उन्होंने आम लोगों से भी शहीदों के सम्मान में एकजुट रहने की अपील की। उन्होंने जोर दिया कि इस प्रकार के प्रतिबंध किसी भी सच्चे लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं हैं।

इस मामले पर राज्य में विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। कई दलों ने उमर अब्दुल्ला के समर्थन में ट्वीट करते हुए कहा है कि शहीदों के सम्मान में कोई समझौता नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर, प्रशासन ने कहा है कि कानून और व्यवस्था की स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है, लेकिन राजनीतिक दलों के बीच चल रहे असहमति को बातचीत के माध्यम से सुलझाने की बात कही गई है।

यह विवाद जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक गतिरोध को फिर से उजागर करता है, जहां लोकतंत्र और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। उमर अब्दुल्ला की यह टिप्पणी केंद्र सरकार के उस दावे के खिलाफ है जिसमें कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर में स्थिति पूरी तरह से सामान्य है।

राज्य की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए, यह घटना आगामी चुनावों और राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। शहीदों के प्रति आदर और इनके संघर्ष की यादों को जीवित रखने की जिम्मेदारी सभी राजनीतिक पार्टियों और प्रशासन की है ताकि जम्मू-कश्मीर में स्थिरता और विकास की राह प्रशस्त हो सके।

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