राज्य समाचार: महाराष्ट्र में भूमि सर्वेक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव, जनता को मिलेगी राहत

महाराष्ट्र सरकार ने राज्य की भूमि सर्वेक्षण (Land Survey) व्यवस्था में बड़ा सुधार लागू करने का निर्णय लिया है। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य जमीन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बढ़ाना, भ्रष्टाचार कम करना और लोगों को समय पर सेवाएं उपलब्ध कराना है। सरकार के इस फैसले से किसानों, जमीन मालिकों और संपत्ति से जुड़े लोगों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।
राज्य में लंबे समय से भूमि सर्वेक्षण और सीमांकन के मामलों में देरी की शिकायतें मिल रही थीं। कई बार लोगों को अपनी जमीन की नाप-जोख करवाने के लिए महीनों तक इंतजार करना पड़ता था। इस समस्या को देखते हुए सरकार ने सर्वेक्षण शुल्क में कमी करने और प्रक्रिया को अधिक सरल बनाने का फैसला किया है।
नई व्यवस्था के तहत पारिवारिक बंटवारे से जुड़े मामलों में सर्वेक्षण शुल्क को काफी कम कर दिया गया है। अब ऐसे मामलों में केवल ₹200 प्रति उप-विभाजन शुल्क लिया जाएगा। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में दो हेक्टेयर तक की भूमि के नियमित सर्वेक्षण के लिए ₹2,000 और त्वरित सर्वेक्षण के लिए ₹8,000 शुल्क निर्धारित किया गया है। शहरी क्षेत्रों में एक हेक्टेयर तक की भूमि के लिए नियमित शुल्क ₹3,000 तथा त्वरित सेवा के लिए ₹12,000 रखा गया है।
सरकार ने सर्वेक्षण कार्य पूरा करने की समय-सीमा भी तय कर दी है। नियमित सर्वेक्षण को 90 दिनों के भीतर पूरा करना होगा, जबकि त्वरित श्रेणी के मामलों को 30 दिनों के अंदर निपटाया जाएगा। इससे नागरिकों को अनावश्यक देरी का सामना नहीं करना पड़ेगा और भूमि विवादों का समाधान जल्दी हो सकेगा।
इस योजना का एक महत्वपूर्ण पहलू जवाबदेही भी है। यदि सर्वेक्षण के समय आवेदक उपस्थित नहीं रहता है तो उस पर पुनः सर्वेक्षण शुल्क लगाया जा सकता है। वहीं यदि अधिकारी समय पर नहीं पहुंचते हैं तो नागरिकों पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगेगा। इससे प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भूमि सर्वेक्षण प्रक्रिया में सुधार से राज्य में रियल एस्टेट गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा। जमीन के रिकॉर्ड स्पष्ट होने से संपत्ति खरीद-बिक्री और निवेश में आसानी होगी। साथ ही पारिवारिक विवादों और न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या भी कम हो सकती है।
सरकार ने अर्ध-सरकारी और सरकारी संस्थानों के लिए भी विशेष रियायतों की घोषणा की है। अर्ध-सरकारी संस्थानों को 50 प्रतिशत और सरकारी संस्थानों को 75 प्रतिशत तक शुल्क में छूट मिलेगी। इससे सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए भूमि सर्वेक्षण का कार्य अधिक तेज और किफायती होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम राज्य में डिजिटल भूमि प्रबंधन प्रणाली को मजबूत करेगा। आने वाले समय में भूमि रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण और आधुनिक तकनीकों के उपयोग से लोगों को और अधिक सुविधाएं मिल सकती हैं। सरकार का दावा है कि इस नई नीति से भूमि प्रशासन में पारदर्शिता आएगी तथा भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर रोक लगेगी।
कुल मिलाकर महाराष्ट्र सरकार का यह निर्णय राज्य के लाखों किसानों, जमीन मालिकों और आम नागरिकों के लिए राहत भरा साबित हो सकता है। कम शुल्क, तय समय-सीमा और जवाबदेही जैसी व्यवस्थाओं से भूमि सर्वेक्षण प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक प्रभावी और जनहितकारी बनने की संभावना है।

