महिलाओं को फिर इंतजार करने पर मजबूर नहीं किया जा सकता

नई दिल्ली, भारत – भारत में महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग वर्षों से चल रही है, लेकिन इस मुद्दे पर लगातार विलंब एक राजनीतिक आदत बन चुकी है। अब यह समय आ गया है कि इस अनिश्चितता को खत्म किया जाए और महिलाओं के लिए आरक्षण कानून को पारित कर लागू किया जाए। महिलाओं की संख्या जनसंख्या के आधे से अधिक है और वे भारत की राजनीतिक प्रणाली का एक अनिवार्य हिस्सा हैं, फिर भी संसद में उनकी हिस्सेदारी अत्यंत कम है। 2022 के इंटर-पार्लियामेंटरी यूनियन के एक समीक्षा से पता चलता है कि विश्व के राष्ट्रीय संसदीय सदस्यों में महिलाओं की भागीदारी औसतन 26.5% है, जबकि भारत इस मामले में सबसे निचले स्तर पर है, और राज्यसभा में महिलाओं का प्रतिशत केवल 13.9% है।
यह स्थिति भारत के लोकतांत्रिक मूल्य और सिद्धांतों के विपरीत है। संसद, जो कानून बनाने और नीतियों को निर्धारित करने वाली संस्था है, वहां महिलाओं की उपस्थिति न्यूनतम होने से लोकतंत्र की संवैधानिक गरिमा पर प्रश्नचिन्ह लगता है। यह किसी प्रकार की प्रतीकात्मक पहलु नहीं है, बल्कि प्रतिनिधित्व की संरचना में एक मूलभूत कमी है। महिलाएं समाज की आधी आबादी हैं और उनके जीवन को प्रभावित करने वाले कानूनों में उनका उचित प्रतिनिधित्व आवश्यक है। यह लंबित मुद्दा सामाजिक और संस्थागत बाधाओं के कारण बना हुआ है, जो पुरुष प्रधान सत्ता को बनाए रखती हैं।
लोकतंत्र की कमी, न कि प्रतीकात्मक अंतर
महिला आरक्षण कानून महिलाओं को किसी विशेष कृपा के रूप में नहीं बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में प्रदान किया जाना चाहिए। संविधान में पहले से ही महिलाओं के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति है और भारत ने भेदभाव वाले संरचनात्मक कारकों के विरुद्ध आरक्षण का समर्थन किया है। लोकतंत्र तभी पूरा माना जाएगा जब वह समाज के प्रत्येक वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे। यह भी विश्व स्तर पर प्रमाणित हो चुका है कि कानूनन आरक्षण महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का सबसे प्रभावी तरीका है।
ग्राम स्तर पर पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के आरक्षण ने राजनीतिक भागीदारी के स्वरूप को बदला है। इससे महिलाओं को नेतृत्व के अवसर मिले हैं और वे राजनीतिक अनुभव जुटा पाईं हैं। इस संदर्भ में यह तर्क अस्वीकार्य है कि आरक्षण गांव स्तर पर ठीक है पर संसद या विधानसभाओं में नहीं।
दरकिनार करने वाला विलंब स्वीकार्य नहीं
वर्तमान राजनीतिक बहस में कुछ विपक्षी पार्टियां, विशेषकर सोनिया गांधी, कहती हैं कि महिला आरक्षण पर देरी का कारण सीमांकन (डेलिमिटेशन) है। उनका तर्क है कि सीमांकन पर पूरी तरह से विचार-विमर्श होना चाहिए ताकि छोटे राज्यों या परिवार नियोजन में सफल राज्यों के हितों की रक्षा हो सके। हालांकि, सीमांकन और महिलाएं आरक्षण ज्यों प्रशासनिक रूप से जुड़े हैं, पर इनके राजनीतिक और नैतिक आयाम भिन्न हैं। महिलाओं को पार्लियामेंट में आरक्षण के लिए और अधिक इंतजार कराना उचित नहीं है।
यदि संसद 2011 की जनगणना के आधार पर 2029 लोकसभा चुनाव तक महिला आरक्षण को लागू करने के लिए विधेयक पारित करती है, तो सीमांकन पर भी पारदर्शी और गंभीर बहस होनी चाहिए। लेकिन सीमांकन के सवाल को महिलाओं के आरक्षण पर अस्थायी बहाना बनने नहीं दिया जाना चाहिए। महिलाओं ने वर्षों तक अनेक समितियों और राजनीतिक सहमतियों का इंतजार किया है, अब उन्हें उचित प्रतिनिधित्व मिलने का समय आ गया है।
कांग्रेस के अभिलेख से सीख
महिला आरक्षण बिल का इतिहास लंबा और निराशाजनक रहा है। कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने इसे 1996, 1997 और 1998 में पारित कराने का प्रयास किया, लेकिन वह कभी अंतिम मंजूरी नहीं पा सका। आज कांग्रेस महिलाओं के अधिकारों का समर्थन करने का दावा करती है, लेकिन उसके कार्यकाल में यह अवसर गंवा दिया गया। इस प्रकार अब कांग्रेस को महिलाओं की प्रतिनिधित्व में देरी के लिए बहाने बनाने के बजाय जिम्मेदारी समझनी होगी।
सारांशतः, महिलाओं का प्रतिनिधित्व राजनीतिक सौदेबाजी या राजनीतिक विशेषाधिकार नहीं बल्कि एक संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार है। इसके द्वारा न केवल जनसांख्यिकीय सच्चाई का सम्मान होगा, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में व्यापक और विविधतापूर्ण दृष्टिकोण लाया जाएगा। भारत अब और इंतजार नहीं कर सकता। संसद को चाहिए कि वह महिला आरक्षण कानून को शीघ्रता से पारित करे और उसे लागू करे, ताकि महिला नेतृत्व को सशक्त रूप दिया जा सके।



