कैसे पट्टनलेख विशेषज्ञ एस. राजावेलु ने तमिलनाडु के मंदिरों की खोज के लिए शिलालेखों का उपयोग किया

चेन्नई, तमिलनाडु – तमिलनाडु की धरोहरों और प्राचीन मंदिरों को लेकर हाल ही में हुए एक साक्षात्कार में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् एस. राजावेलु ने अपने उत्खनन कार्यों और खोजों पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि शिलालेखों के अध्ययन के माध्यम से तमिलनाडु के समृद्ध और विविध इतिहास के नए पहलुओं का पता चला है।
राजावेलु ने कहा कि इन उपलों ने मंदिरों की उन्नति और उनके पीछे की सामाजिक-धार्मिक परिस्थितियों को समझने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने यह भी बताया कि शिलालेख, जो प्राचीन काल से संरक्षित हैं, विभिन्न राजवंशों, उनकी नीतियों, पूजा पद्धतियों और स्थानीय लोगों के जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं।
उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि इन खोजों के जरिए यह स्पष्ट होता है कि तमिलनाडु का इतिहास सिर्फ धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत समृद्ध रहा है। इस सबूत के आधार पर, पुरातत्वविद्हों को वहाँ के सामाजिक बदलावों और वास्तुकला के विकास को समझने में मदद मिली है।
राजावेलु के अनुसार कई बार इन शिलालेखों को पढ़ना और सही ढंग से अनुवाद करना चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि उनमें पुरानी तमिल भाषा और लिपि का इस्तेमाल होता है। फिर भी इन दस्तावेजों के संरक्षण और अध्ययन ने नई खोजों का मार्ग प्रशस्त किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक प्राचीन धरोहरों की सुरक्षा और उचित संरक्षण न हो, तब तक इतिहास की बहुत-सी महत्वपूर्ण जानकारियां अधूरी रह जाएंगी। इसलिए राज्य सरकार ने भी कुछ परियोजनाएं शुरू की हैं, ताकि इन खजानों को संरक्षित रखा जा सके और शोधकर्ताओं के लिए सुविधाजनक बनाया जा सके।
इस प्रकार, एस. राजावेलु जैसे पुरातत्वविदों के प्रयासों से तमिलनाडु का इतिहास न केवल संरक्षित हुआ है, बल्कि जनता के समक्ष भी प्रस्तुत हुआ है। इससे नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर मिलता है और वे अपने अतीत को समझ पाते हैं।
अंत में, पुरातन शिलालेखों की मदद से तमिलनाडु के मंदिर और उनकी कहानी एक बार फिर जी उठ रही है, जिससे ये स्थल सिर्फ धार्मिक केंद्र न रहकर सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अध्ययन के महत्वपूर्ण केन्द्र बन गए हैं।

